माहेश्वरी समाज के गौरवशाली इतिहास की शोधपरक जानकारी को पुरे भारत वर्ष के विभिन्न क्षैत्रों से संग्रहित कर, पूर्व में प्रकाशित वंशोत्पति ग्रन्थों व छोटी से छोटी पुस्तको, आलेखो का गहनता के साथ अध्ययन कर उसकी तथ्यात्मक जानकरी का शोध करते हुए वर्ष 1997 में महेश रत्न स्व. श्री रामचन्द्र जी बिहानी ने अथक प्रयासों और कई बरसों के गहनतम शोध के पश्चात् अपने हृदय की इस जिज्ञासा कि ‘‘माहेश्वरी समाज का एक शोधपूर्ण इतिहास तैयार किया जाए’’ को पूर्ण करते हुए ‘‘माहेश्वरी वंशोत्पति’’ का प्रथम संस्करण महिमामयी माहेश्वरी समाज के समक्ष सहज-सरल और पठनीय शैली में इस प्रकार प्रस्तुत किया था कि इस पुस्तक के संग्रहणीय स्वरूप का सर्वत्र सराहना के साथ स्वागत किया गया था।
इस पुस्तक में माहेश्वरी वंशोत्पति, वंशावली, नख, गौत्र, मूल खांप, उप खांप, मूल खांपो के इतिहास, वंशोत्पति के रेखाचित्र, कुलमाताओं की विस्तृत जानकारियों को समाहित किया गया। जो उनके गहन शोध का साक्षात प्रस्तुत करता है।
माहेश्वरी सेवक द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के प्रकाशित होने के पश्चात समाज के सम्मुख सरल एवं बोधगम्य भाषा में प्राप्त समाज के इतिहास की तथ्यात्मक जानकारी प्राप्त होनें पर भारत ही नहीं वरन् विदेशो में बसे समाज परिवारों ने भी पुस्तक की प्रशंसा करते हुए साधुवाद दिया था।
स्व. श्री रामचन्द्र जी बिहानी द्वारा शोधपरक जानकारी के साथ सम्पादित तथा स्व. श्री पुरूषोत्तम जी बिहानी के अथक प्रयासों से तैयार पुस्तक माहेश्वरी वंशोत्पति के कुछ महत्वपूर्ण अंश आज आप सबके साथ यहां साझा करते हुए अपार हर्ष हो रहा है। आशा है समाज बन्धुओ के लिये यह जानकारी उपयोगी साबित होगी।
इस पुस्तक में माहेश्वरी वंशोत्पति, वंशावली, नख, गौत्र, मूल खांप, उप खांप, मूल खांपो के इतिहास, वंशोत्पति के रेखाचित्र, कुलमाताओं की विस्तृत जानकारियों को समाहित किया गया। जो उनके गहन शोध का साक्षात प्रस्तुत करता है।
माहेश्वरी सेवक द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के प्रकाशित होने के पश्चात समाज के सम्मुख सरल एवं बोधगम्य भाषा में प्राप्त समाज के इतिहास की तथ्यात्मक जानकारी प्राप्त होनें पर भारत ही नहीं वरन् विदेशो में बसे समाज परिवारों ने भी पुस्तक की प्रशंसा करते हुए साधुवाद दिया था।
स्व. श्री रामचन्द्र जी बिहानी द्वारा शोधपरक जानकारी के साथ सम्पादित तथा स्व. श्री पुरूषोत्तम जी बिहानी के अथक प्रयासों से तैयार पुस्तक माहेश्वरी वंशोत्पति के कुछ महत्वपूर्ण अंश आज आप सबके साथ यहां साझा करते हुए अपार हर्ष हो रहा है। आशा है समाज बन्धुओ के लिये यह जानकारी उपयोगी साबित होगी।
वंशोत्पत्ति
खण्डेला नगर में खडगल सेन राजा राज्य करता था। उसके राज्य में सारी प्रजा सुख और शांति से रहती थी। राजा धर्मावतार और प्रजा प्रेमी था, परंतु उसके पुत्र नहीं था। इसलिए राजा और रानी चिंतित रहते थे। राजा ने मंत्रियों से परामर्श कर पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। राजा ने श्रद्धापूर्वक यज्ञ करवाकर ऋषियों से आशीर्वाद व वरदान मांगा। ऋषियों ने वरदान दिया और साथ-साथ यह भी कहा कि तुम्हारे वह पुत्र होगा जो बहुत ही पराक्रमी होगा, यह चक्रवती राजा होगा। परंतु 16 वर्ष की अवस्था तक उसे उत्तर दिशा की ओर न जाने देना राजा ने यह स्वीकार कर लिया
राजा के 24 रानियां थी। समय पाकर उनमें चम्पावती रानी गर्भवती हुई और पुत्र को जन्म दिया। राजा ने पुत्रोत्सव बहुत ही हर्षोल्लास से मनाया। ज्योतिषियों ने राजकुमार का नाम सुजान कुंवर रखा। सुजान कुंवर बहुत ही प्रखर बुद्धि व समझदार निकला। थोड़े समय में वह विद्या व शस्त्र विद्या में आगे बढ़ने लगा। देवयोग से जैन मुनि खंडेला नगर में आये और सुजान कुंवर को उन्होंने जैन धर्म का उपदेश दिया। सुजान कुंवर उनके उपदेश से प्रभावित हो गया और जैन धर्म की दीक्षा ग्रहण कर ली तथा राज्य भर में जैन धर्म का प्रचार प्रारम्भ कर दिया।
एक दिन राजकुमार 72 उमरावों को साथ लेकर शिकार खेलने के लिए जंगल में गया और वहां उसने उमरावों से कहा कि आज हमें उत्तर दिशा की ओर ही चलना है। क्या कारण है जो पिताजी मुझे उस ओर जाने नहीं देते। आज हमें उस तरफ ही चलना है। राजकुमार उत्तर दिशा की ओर चल दिया।
सूर्यकुण्ड के पास जाकर राजकुमार ने देखा, यहां तो 6 ऋषि यज्ञ कर रहे हैं। वेद ध्वनि बोल रहे हैं। यह देखते ही सुजान कुंवर आग बबूला हो गया और क्रोधित होकर कहने लगा, इस और मुनि यज्ञ करते हैं इसलिए पिताजी ने मुझे इधर आने से रोक रखा था, मुझे भुलावा दिया जा रहा था। उसी समय उसने उमरावों को आदेश दिया कि यज्ञ विध्वंस कर दो और यह सामग्री नष्ट कर दो।
उमरावों ने आदेश पाते ही ऋषियों को घेर लिया और यज्ञ विध्वंस करने लगे। ऋषि भी क्रोध में आ गये और उन्होनंे श्राप दिया कि सब पत्थरवत हो जावे। श्राप देते ही राजकुमार सहित सारे उमराव पत्थर के हो गये। जब यह समाचार राजा खडगल सेन ने सुना तो उन्होंने अपने प्राण तज दिये। राजा के साथ 16 रानियां सती हुई।
राजकुंवर की कुंवरानी (चन्द्रावती) उमरावों की स्त्रियों को साथ लेकर ऋषियों की शरण में गई, अनुनय विनती की तब ऋषियों ने उन्हें बताया कि हम श्राप दे चुके हैं अब तुम भगवान गौरीशंकर की आराधना करो। यहां निकट ही एक गुफा है। जिसमें जाकर भगवान महेश का पंचाक्षर (नमः शिवाय) मन्त्र का जाप करो। भगवान की कृपा से सब पुनः शुद्ध बुद्धि वाले व चेतन हो जायेंगे। राजकुंवरानी सारी स्त्रियों सहित गुफा में जाकर तपस्या करने लगी। दत्तचित्त होकर तपस्या में लीन हो गई।
भगवान महेश उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर यहां पधारे तब पार्वती जी ने भगवान शंकर से इन जड़वत हुई मूर्तियों के बारे में चर्चा आरम्भ कि तभी राजकुमारी ने आकर पार्वती जी के चरणों में प्रणाम किया। पार्वती जी ने आशीर्वाद दिया – सौभाग्यवती हो, धन, पुत्रों से परिपूर्ण हो, तुम्हारे पति को सुखी देखो। इस पर राजकुंवरानी ने कहा माता – हमारे पतिदेव तो ऋषियों के श्राप से पत्थरवत हो गये हैं, अतः आप इनका श्राप मोचन करो।
पार्वती जी ने भगवान महेश से प्रार्थना की कि महाराज इनका श्राप मोचन करें, इन्हें मोह निद्रा से मुक्त कर चेतना में लाइये। इस पर भगवान महेश ने उन्हें चेतन कर दिया। चेतन अवस्था में आते ही उन्होंने भगवान महेश पार्वती को घेर लिया। इस पर भगवान महेश ने कहा कि क्षमावान बनो और क्षत्रित्व छोड़कर वैश्य वर्ण धारण करो। उमरावों ने स्वीकार किया परंतु हाथों से हथियार नहीं छूटे।
इस पर भगवान महेश ने कहा सूर्यकुण्ड में स्नान करो। फिर सबने सूर्यकुण्ड में स्नान किया। तब उनके हथियार पानी में गल गये। उस दिन से उस कुण्ड का नाम लोहा गल (लोहागर) हो गया। वे स्नान कर भगवान महेश की प्रार्थना करने लगे।
भगवान महेश ने कहा कि आज से तुम्हारी जाति पर मेरी छाप रहेगी यानि माहेश्वरी कहलाओगे और तुम व्यापार करो इसमें फूलोगे-फलोगे। राजकुमार व सुभटों ने स्त्रियों को स्वीकार नहीं किया कहा कि हम तो वैश्य बन गये पर ये अभी क्षत्राणियां हैं। हमारा पुर्नजन्म हो चुका है। हम इन्हें कैसे स्वीकार करें। राजकुमारी से माता पार्वती जी ने कहा कि तुम स्त्री पुरुष हमारी परिक्रमा करो जो जिसकी पत्नी है अपने आप गठबंधन हो जायेगा। इस पर सबने परिक्रमा की। उस दिन से माहेश्वरी बनने की बात याद रहे इसलिए चार फेरे बाहर के लिए जाते हैं।
जिस दिन भगवान महेश ने वरदान दिया उस दिन युधिष्ठिर सम्वत् 9 ज्येष्ठ शुक्ला नवमी थी। ऋषियों ने आकर भगवान से अनुग्रह किया कि महाराज इन्होंने हमारे यज्ञ को विध्वंस किया और आपने इनको श्राप मोचन कर दिया अब हमारा यज्ञ पूर्ण कैसे होगा ? इस पर भगवान महेश ने कहा आप इन्हें यजमान बना लो।
ये तुम्हें गुरु मानेंगे। हर समय यथाशक्ति द्रव्य देते रहेंगे फिर सुजान कुंवर को कहा कि तुम इनकी वंशावली रखो। ये तुम्हें अपना जागा मानेंगे और दूसरे जो उमराव थे उनके नाम पर एक एक जाति बनी जो 72 खांप है। पांच खांप बाद में मिली। एक-एक खांप में कई नख हो गए हैं जो काम के कारण, गांव के नाम पर और बुजुर्गों के नाम पर बन गये हैं।
राजा के 24 रानियां थी। समय पाकर उनमें चम्पावती रानी गर्भवती हुई और पुत्र को जन्म दिया। राजा ने पुत्रोत्सव बहुत ही हर्षोल्लास से मनाया। ज्योतिषियों ने राजकुमार का नाम सुजान कुंवर रखा। सुजान कुंवर बहुत ही प्रखर बुद्धि व समझदार निकला। थोड़े समय में वह विद्या व शस्त्र विद्या में आगे बढ़ने लगा। देवयोग से जैन मुनि खंडेला नगर में आये और सुजान कुंवर को उन्होंने जैन धर्म का उपदेश दिया। सुजान कुंवर उनके उपदेश से प्रभावित हो गया और जैन धर्म की दीक्षा ग्रहण कर ली तथा राज्य भर में जैन धर्म का प्रचार प्रारम्भ कर दिया।
एक दिन राजकुमार 72 उमरावों को साथ लेकर शिकार खेलने के लिए जंगल में गया और वहां उसने उमरावों से कहा कि आज हमें उत्तर दिशा की ओर ही चलना है। क्या कारण है जो पिताजी मुझे उस ओर जाने नहीं देते। आज हमें उस तरफ ही चलना है। राजकुमार उत्तर दिशा की ओर चल दिया।
सूर्यकुण्ड के पास जाकर राजकुमार ने देखा, यहां तो 6 ऋषि यज्ञ कर रहे हैं। वेद ध्वनि बोल रहे हैं। यह देखते ही सुजान कुंवर आग बबूला हो गया और क्रोधित होकर कहने लगा, इस और मुनि यज्ञ करते हैं इसलिए पिताजी ने मुझे इधर आने से रोक रखा था, मुझे भुलावा दिया जा रहा था। उसी समय उसने उमरावों को आदेश दिया कि यज्ञ विध्वंस कर दो और यह सामग्री नष्ट कर दो।
उमरावों ने आदेश पाते ही ऋषियों को घेर लिया और यज्ञ विध्वंस करने लगे। ऋषि भी क्रोध में आ गये और उन्होनंे श्राप दिया कि सब पत्थरवत हो जावे। श्राप देते ही राजकुमार सहित सारे उमराव पत्थर के हो गये। जब यह समाचार राजा खडगल सेन ने सुना तो उन्होंने अपने प्राण तज दिये। राजा के साथ 16 रानियां सती हुई।
राजकुंवर की कुंवरानी (चन्द्रावती) उमरावों की स्त्रियों को साथ लेकर ऋषियों की शरण में गई, अनुनय विनती की तब ऋषियों ने उन्हें बताया कि हम श्राप दे चुके हैं अब तुम भगवान गौरीशंकर की आराधना करो। यहां निकट ही एक गुफा है। जिसमें जाकर भगवान महेश का पंचाक्षर (नमः शिवाय) मन्त्र का जाप करो। भगवान की कृपा से सब पुनः शुद्ध बुद्धि वाले व चेतन हो जायेंगे। राजकुंवरानी सारी स्त्रियों सहित गुफा में जाकर तपस्या करने लगी। दत्तचित्त होकर तपस्या में लीन हो गई।
भगवान महेश उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर यहां पधारे तब पार्वती जी ने भगवान शंकर से इन जड़वत हुई मूर्तियों के बारे में चर्चा आरम्भ कि तभी राजकुमारी ने आकर पार्वती जी के चरणों में प्रणाम किया। पार्वती जी ने आशीर्वाद दिया – सौभाग्यवती हो, धन, पुत्रों से परिपूर्ण हो, तुम्हारे पति को सुखी देखो। इस पर राजकुंवरानी ने कहा माता – हमारे पतिदेव तो ऋषियों के श्राप से पत्थरवत हो गये हैं, अतः आप इनका श्राप मोचन करो।
पार्वती जी ने भगवान महेश से प्रार्थना की कि महाराज इनका श्राप मोचन करें, इन्हें मोह निद्रा से मुक्त कर चेतना में लाइये। इस पर भगवान महेश ने उन्हें चेतन कर दिया। चेतन अवस्था में आते ही उन्होंने भगवान महेश पार्वती को घेर लिया। इस पर भगवान महेश ने कहा कि क्षमावान बनो और क्षत्रित्व छोड़कर वैश्य वर्ण धारण करो। उमरावों ने स्वीकार किया परंतु हाथों से हथियार नहीं छूटे।
इस पर भगवान महेश ने कहा सूर्यकुण्ड में स्नान करो। फिर सबने सूर्यकुण्ड में स्नान किया। तब उनके हथियार पानी में गल गये। उस दिन से उस कुण्ड का नाम लोहा गल (लोहागर) हो गया। वे स्नान कर भगवान महेश की प्रार्थना करने लगे।
भगवान महेश ने कहा कि आज से तुम्हारी जाति पर मेरी छाप रहेगी यानि माहेश्वरी कहलाओगे और तुम व्यापार करो इसमें फूलोगे-फलोगे। राजकुमार व सुभटों ने स्त्रियों को स्वीकार नहीं किया कहा कि हम तो वैश्य बन गये पर ये अभी क्षत्राणियां हैं। हमारा पुर्नजन्म हो चुका है। हम इन्हें कैसे स्वीकार करें। राजकुमारी से माता पार्वती जी ने कहा कि तुम स्त्री पुरुष हमारी परिक्रमा करो जो जिसकी पत्नी है अपने आप गठबंधन हो जायेगा। इस पर सबने परिक्रमा की। उस दिन से माहेश्वरी बनने की बात याद रहे इसलिए चार फेरे बाहर के लिए जाते हैं।
जिस दिन भगवान महेश ने वरदान दिया उस दिन युधिष्ठिर सम्वत् 9 ज्येष्ठ शुक्ला नवमी थी। ऋषियों ने आकर भगवान से अनुग्रह किया कि महाराज इन्होंने हमारे यज्ञ को विध्वंस किया और आपने इनको श्राप मोचन कर दिया अब हमारा यज्ञ पूर्ण कैसे होगा ? इस पर भगवान महेश ने कहा आप इन्हें यजमान बना लो।
ये तुम्हें गुरु मानेंगे। हर समय यथाशक्ति द्रव्य देते रहेंगे फिर सुजान कुंवर को कहा कि तुम इनकी वंशावली रखो। ये तुम्हें अपना जागा मानेंगे और दूसरे जो उमराव थे उनके नाम पर एक एक जाति बनी जो 72 खांप है। पांच खांप बाद में मिली। एक-एक खांप में कई नख हो गए हैं जो काम के कारण, गांव के नाम पर और बुजुर्गों के नाम पर बन गये हैं।
वन्शोत्पति – महाभारत काल से पुर्व
हम श्री शिवकरण जी दरक के शोध ग्रन्थ के आधार पर संक्षेप विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं। यह विवरण अति प्राचीन ग्रंथ में संवाद के रूप में है। इसकी भाषा मूल संस्कृत है। वार्तालाप श्री मंगूमल जी चाण्डक व श्री मंगनीराम जी जागा की है। यह 200 वर्ष पहले की वार्ता समझी जाती है। अभी तक सर्वमान्य एवं ठोस प्रमाणिक तथ्य तो कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं है शोध कार्य चल रहा है। समाज की जानकारी हेतु इसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है। अंतिम निर्णय यह नहीं है।
द्वापर के चतुर्थ चरण में जब महाराज शांतनु हस्तिनापुर में राज्य करते थे, उस समय देहली में कोई 250 कोस पश्चिम में खण्डेला नामक नगर में खड़गसेन नामक एक क्षत्रिय चौहान वंशीय राजा राज्य करते थे। राजा परम उदार हृदय, धार्मिक और शील स्वभाव के थे। उनके सूर्य कंवर और इन्द्र कंवर नाम की दो परम सुन्दरी और पतिव्रता रानियां थी।
राजा की आयु प्रौढ़ हो चली थी किंतु अभी तक कोई सन्तान नहीं हुई थी इससे रानियों का मन सदा खिन्न रहता था। एक दिन रानी सूर्य कंवर ने राजा से कहा पुत्र के बिना यह महल शून्य है। पुत्र के बिना मनुष्य की सद्गति भी नहीं होती और पुत्र न होने से इस राज्य का उत्तराधिकारी कौन होगा ? अतः आप ऐसा प्रयास करें कि हमें पुत्र प्राप्त हो। रानी की बात सुनकर राजा को हर समय बहुत चिन्ता रहने लगी। एक दिन राजा ने अपने दरबार में कहा हे मंत्रियों और विद्धतगण मेरा चौथापन आने को है, किंतु मैं अभी तक पुत्र रत्न से वंचित हूं। पुत्र के बिना कैसा राज्य और कैसी प्रजा ?
पुत्रहीन को कोई सुख नहीं और न ही पुत्रहीन के लिए स्वर्ग है। पुत्र शून्य-गृह से तो वनवास में रहना अच्छा है। अतः मेरा विचार है कि राजकार्य आप लोगों को संभला कर वन में तपस्या के लिये जा रहा हूं। राजा की बात सुनकर सभी सभासद उदास हुए किंतु कोई जवाब नहीं दिया। संयोग से उस सभा में ब्रह्मज्ञानी ऋषि याज्ञवलक्य भी विद्यमान थे। मुनि बोले राजन् ! आप चिन्ता न करें आपको पूर्व जन्म के शाप वंश पुत्र नहीं होता है। इस पर राजा ने पूछा हे ऋषिवर ! बताइये मैं पूर्व जन्म में कौन था और किस शाप वंश पुत्र नहीं होता है। ऋषि कहने लगे हे राजन् ! आप पूर्व जन्म में मरूस्थल में रहने वाले चांडू नामक एक शूद्र थे। आखेट से ही जीविका उपार्जन करते थे।
एक दिन गर्भिणी मृगी पर आपकी शिकार करने की दृष्टि पड़ी उसका प्रसवकाल निकट था। वह अधिक दौड़ नहीं सकती थी। तुमने उस पर बाण चलाया और घायल करके गिरा दिया यह मृगी रूप में कोई द्विज पत्नी थी। उसने शाप दिया हे दुष्ट ! तुम्हारे कोई संतान नहीं होगी और जब तक श्री शंकर जी को प्रसन्न नहीं करोगे पुत्र नहीं पाओगे। उसके शाप से चांडू के उस जन्म में कोई संतान नहीं हुई। इसके बाद वह पुष्कर के पास रहने लगा।
बहुत समय तक पुष्कर सरोवर में स्नान करने मात्र से पुण्य का भागी बना और इस जन्म में राजा हुआ। यह आपका पूर्ववत है। पुनः राजा के अनुरोध पर मुनिराज ने बतलाया कि भगवान शंकर बहुत दयालु है और बहुत जल्दी प्रसन्न होकर मनोरथ सफल करते हैं। यहां से कुछ दूर पूर्व दिशा में भास्कर क्षेत्र हैं जिसके समीप पीपल का एक सूखा पेड़ है। इस पेड़ की जड़ के समीप सात हाथ नीचे शिवलिंग है। आप उसे प्राप्त कर वहां विशाल मंदिर बनवाकर शिवलिंग स्थापित करें और सेवा करें। इससे आपका मनोरथ पूर्ण होगा। आपको पुत्र की प्राप्ति होगी।
राजा ने ऋषिराज के कहे अनुसार कार्य किया और भक्तिभाव से अहर्निश रानी सहित षडाक्षर (ऊँ नमः शिवाय) का जप लगातार दो वर्ष तक करता रहा। एक दिन वृषभध्वज नीलकण्ठ भगवान शिव पार्वती सहित प्रकट हुए। प्रसन्न मुद्रा में भगवान ने राजा से वर मांगने को कहा जब राजा ने पुत्र प्रदान करने का वर मांगा। ‘एवमस्तु’ कहकर भगवान अर्न्तध्यान हो गए।
कुछ दिनों बाद राजा की बड़ी रानी गर्भवती हुई और 10 वें मास एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया। राजा ने इस शुभ बेला पर दिल खोलकर पुण्य किया और पुत्र का नाम सुजान सेन रखा। एक दिन राजा की भेंट जाबाली मुनि से हुई। मुनि ने नवजात पुत्र की कुण्डली देखकर राजा से कहा हे राजन् ! आपका पुत्र रूपवान, बलवान, रणकोविद, सुलक्षण व सर्वगुण सम्पन्न होगा, लेकिन इसकी युवा अवस्था में एक कष्टदायक घटना होगी परंतु परिणाम में सुख पायेगा। राजा का पुत्र धीरे-धीरे 16 वर्ष का होने लगा। राजा ने उसका विवाह राजा युद्धवीर की परम सुन्दरी कन्या चन्द्रावती से कर दिया। कुछ समय बाद राजन ने पुत्र को युवराज बना दिया और स्वयं वानप्रस्थाश्रम ग्रहण करके वन में तपस्या करने चला गया। राजा व रानी ने 12 वर्ष तक वन में घोर तपस्या की और पुष्कर के निकट दोनों ने प्राण त्याग दिये। सुजान सेन ने उनकी अन्त्येष्टि की और उनके निमित्त दान दक्षिणा खूब की।
पुराणों में लिखा है कि राजाओं में चार प्रकार के दुर्व्यसन होते हैं जिनके कारण कष्ट में पड़ते हैं। 1. धूत यानि जुआ 2. मद्यपान 3. मृगया 4. परस्त्री आशक्ति। एक बार सुजान सेन तीसरे व्यसन यानि मृगया में आसक्त होकर अपने मंत्रियों, सभासदों और सामन्तों सहित वन में आखेट खेलने गया। आखेट खेलते हुए वे जब काफी थकान महसूस करने लगे तब वे प्यास बुझाने एक सरोवर के पास गये। वहां कन्द मूल व फल लगे थे। सरोवर में निर्मल जल था। राजा ने सबके साथ सरोवर में जल पिया और वहां विश्राम करने लगे।
तब राजा के अन्य सेवक अपने हथियार जो रक्त रंजित थे, उन्हें सरोवर में धोने लगे। सरोवर का पानी लाल हो गया। संयोग से उसी समय एक ऋषिवर जल पात्र लिये वहां पहुंचे और सरोवर का लाल जल देखकर क्रोधित हुए। सरोवर का जल मुनिगण श्री महेश्वर के यज्ञ में प्रयोग करते थे। तपोनिधान मुनि ने चारों तरफ दृष्टि डाली और मन में संकल्प मात्र से चार कोस के फैलाव का लोहमय दुर्ग बना दिया जिसका कोई द्वार नहीं था। राजा व मंत्रियों को जब यह मालूम हुआ तो चिन्तित हुए किले से बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं था। उन्होंने बहुत कोलाहल किया और दुर्ग तोड़ने का काफी प्रयास किया। तब मुनिगण ने उन्हें श्राप दिया कि तुम सब पाषाण हो जाओ। राजा 72 साथियों सहित पाषाण रूप हो गये।
इस लोहे के किले से बाहर जो सैनिक इत्यादि रह गये थे काफी समय तक राजा का इन्तजार करने के बाद महल में जाकर रानी चन्द्रावती को सब हाल बतलाया। रानी चन्द्रावती यह सब विवरण सुनकर बहुत शोकाकुल हो गई और राजा के सब साथियों की स्त्रियों को भी सूचना दी। राजा युद्धवीर ने अपने शूरवीर पुत्र जयन्त को सिपाहियों के साथ खण्डेला भेजा। जयन्त जब अपनी बहन चन्द्रावती से मिला तो सारा हाल मालुम किया और बहन का रूदन देख न सका। रानी चन्द्रावती के अनुरोध पर शूरवीर जयन्त राजकार्य एक मंत्री के रूप में देखने लगा। कुछ समय उपरान्त जाबाली मुनि नगर में आये जयन्त ने उनका बहुत सत्कार किया और रानी चन्द्रावती की दुःख भरी कहानी सुनाई ! मुनिवर ने रानी चन्द्रावती को बतलाया कि खड़गसेन को पहले बताया कि पुत्र के जीवन में एक घटना घटेगी। सो हे ! रानी तुम्हारा पति मृगया-क्रीड़ा करता हुआ भास्कर क्षेत्र में जा पहुंचा। उस क्षेत्र में 6 महातपस्वी तपोधन ऋषि 88 वर्ष से श्री महेश्वर यज्ञ कर रहे थे यज्ञ सौ वर्षों में समाप्त होने वाला था।
मुनिगण के यज्ञ कार्य में तुम्हारे पति की क्रीड़ा से बाधा होने लगी। मुनि बोले ! हे कल्याणी ! गत वैशाख पूर्णिमा के दिन तुम्हारे पति मंत्रियों सहित जड़ रूप हुए है और उस समय बृहस्पति मेष राशि में स्थित थे। उस यज्ञ को सम्पूर्ण होने में 12 वर्ष शेष है।
कार्तिक शुक्ला के 10वें दिन बारह साल बाद देव गुरु बृहस्पति पुनः मेष राशि में आवेंगे और भगवान महेश प्रकट होंगे। मुनियों की विनती से भगवान शंकर राजा तथा मंत्रियों सहित अन्यों को जीवन प्रदान करेंगे। मुनिवर बोले हे रानी ! अब तुम इस राज्य पर राजा खड़गसेन के छोटे भाई भानूसेन के पोते दण्डधर को बैठा दो और तुम मंत्रीगणों की स्त्रियों सहित पतिव्रत धर्म का पालन करती हुई तुम्हारे श्वसुर द्वारा निर्मित भगवान शंकर के मंदिर में आराधना करो और पंचाक्षर नमः शिवाय का जप करो।
भगवान शंकर शिव के प्रसाद से तुम्हारे पति का जन्म हुआ था और अब उसी आशुतोष उमापति की कृपा से पुनः अपने रूप को धारण करेगा किंतु इसके उपरान्त क्षत्रिय धर्म त्याग कर वैश्य धर्म का धारण सब मंत्रियों सहित करना होगा। रानी चन्द्रावती ने सुजान सेन के चचेरे भतीजे दण्डधर को राजगद्दी पर बैठाया। जयंत पुनः अपने पिता युद्धवीर के पास चला गया।
इधर रानी चन्द्रावती शिवालय में सबके साथ आराधना करने लगी। जब द्वादश वर्ष व्यतीत होने आये तब एक दिन भगवान आशुतोष उमापति प्रकट हुए और रानी की आराधना से प्रसन्न होकर कहने लगे कि तुम्हारे पति बहुत जल्द साथियों सहित मनुष्य रूप धारण करके क्षत्रिय धर्म त्याग देंगे और वैश्य बन जायेंगे। रानी बहुत प्रसन्न हुई। भगवान शंकर अन्तर्ध्यान हो गये। रानी ने इसकी सूचना सबको दी और इस शुभ घड़ी का इन्तजार करने लगी। जयन्त जब अपने बहनोई से मिलने आया तो राजा दण्डधर ने उसका खूब स्वागत किया इधर मुनियों के यज्ञ को सौ वर्ष पूरे हो गये थे।
शुभ मुहूर्त में जब ब्रह्मवादी ऋषियों ने यज्ञ में पूर्ण आहूति दी तो नीलकण्ठ भगवान पार्वती सहित प्रकट हुए। भगवान के दर्शन करके मुनिगण भी कृत्य-कृत्य हो गये। स्तुति करने लगे। छःवों मुनिगण की तपस्या पर प्रसन्न होकर भगवान बोले हे मुनिवरों ! तुम्हारे सब मनोरथ पूर्ण हो, तुम्हारे सब काम पूर्ण होंगे। कोई वस्तु तुम्हें अप्राप्य नहीं रहेगी। तब मुनिवर बोले ! देवाधिदेव भगवान वृषभध्वज ! हम लोगों की क्रोधाग्नि में पड़कर राजा सुजानसेन व उसके साथी पाषाण हो गये हैं। आप कृपा करके इन्हें जीवन दें जिससे हमारे मन को भी शांति मिले।
भगवान शंकर बोले ! हे ऋषिवृन्द ! यह राजा हिंसाक्रम में आसक्त होकर मंत्रियों सहित इस गति को पहुंचा है। अतः इन सबको अपने क्षत्रिय धर्म त्याग कर वैश्य धर्म में प्रवृत होना होगा। यह कहकर शूलपाणि ने यज्ञ की भभूत लेकर मंत्र से उन सब पर छिड़की इससे सब जीवित हो गये। भगवान बोले हे राजन् ! तुम अहिंसा त्याग क्षत्रिय धर्म से वंचित हो जाओ तुम्हारे साथ के 72 मंत्री सामन्तगण वैश्य वृत्ति ग्रहण करें और तुम सबकी वंश परम्परा के लेखन करने वाले जागा होंगे। मुनि द्वारा उत्पन्न लोहदुर्ग भी स्वयं जलकर भस्मीभूत हो जावेगा। आज से यह स्थान पवित्र तीर्थ होगा। इन छः ऋषियों की सन्तान तुम लोगों की जाति में पुरोहित का काम करेंगे। मेरे नाम से तुम्हारी माहेश्वरी वैश्य संज्ञा होगी। इतना कहकर अन्तर्ध्यान हो गये।
तदुपरान्त सब मुनियों के चरणों में पड़कर प्रणाम करने लगे। मुनिगण ने मंगल विप्र के द्वारा राजा दण्डधर की सभा में सूचना भेजी इस पर समस्त बन्धु बान्धव, रानी चन्द्रावती तथा मंत्रियों की स्त्रियांे ने अपने पतियों के चरण स्पर्श किये और मुनिवृन्द को प्रणाम किया।
मुनि की आज्ञानुसार सुजानसेन ने सरोवर में स्नान करके राजा दण्डधर का राज्याभिषेक किया और सबने अपने-अपने वस्त्र आदि सहित सरोवर में स्नान किया। जल में हथियार गल गये और उसकी जगह तुला आ गई। हाथ में लेखनी व मसीपात्र (दवात) थी। मुनियों ने कहा कि महादेव के प्रसाद से सुजानसेन ने जागा वृत्ति पाई और अन्य 72 ने वैश्य वृत्ति।
द्वापर के चतुर्थ चरण में जब महाराज शांतनु हस्तिनापुर में राज्य करते थे, उस समय देहली में कोई 250 कोस पश्चिम में खण्डेला नामक नगर में खड़गसेन नामक एक क्षत्रिय चौहान वंशीय राजा राज्य करते थे। राजा परम उदार हृदय, धार्मिक और शील स्वभाव के थे। उनके सूर्य कंवर और इन्द्र कंवर नाम की दो परम सुन्दरी और पतिव्रता रानियां थी।
राजा की आयु प्रौढ़ हो चली थी किंतु अभी तक कोई सन्तान नहीं हुई थी इससे रानियों का मन सदा खिन्न रहता था। एक दिन रानी सूर्य कंवर ने राजा से कहा पुत्र के बिना यह महल शून्य है। पुत्र के बिना मनुष्य की सद्गति भी नहीं होती और पुत्र न होने से इस राज्य का उत्तराधिकारी कौन होगा ? अतः आप ऐसा प्रयास करें कि हमें पुत्र प्राप्त हो। रानी की बात सुनकर राजा को हर समय बहुत चिन्ता रहने लगी। एक दिन राजा ने अपने दरबार में कहा हे मंत्रियों और विद्धतगण मेरा चौथापन आने को है, किंतु मैं अभी तक पुत्र रत्न से वंचित हूं। पुत्र के बिना कैसा राज्य और कैसी प्रजा ?
पुत्रहीन को कोई सुख नहीं और न ही पुत्रहीन के लिए स्वर्ग है। पुत्र शून्य-गृह से तो वनवास में रहना अच्छा है। अतः मेरा विचार है कि राजकार्य आप लोगों को संभला कर वन में तपस्या के लिये जा रहा हूं। राजा की बात सुनकर सभी सभासद उदास हुए किंतु कोई जवाब नहीं दिया। संयोग से उस सभा में ब्रह्मज्ञानी ऋषि याज्ञवलक्य भी विद्यमान थे। मुनि बोले राजन् ! आप चिन्ता न करें आपको पूर्व जन्म के शाप वंश पुत्र नहीं होता है। इस पर राजा ने पूछा हे ऋषिवर ! बताइये मैं पूर्व जन्म में कौन था और किस शाप वंश पुत्र नहीं होता है। ऋषि कहने लगे हे राजन् ! आप पूर्व जन्म में मरूस्थल में रहने वाले चांडू नामक एक शूद्र थे। आखेट से ही जीविका उपार्जन करते थे।
एक दिन गर्भिणी मृगी पर आपकी शिकार करने की दृष्टि पड़ी उसका प्रसवकाल निकट था। वह अधिक दौड़ नहीं सकती थी। तुमने उस पर बाण चलाया और घायल करके गिरा दिया यह मृगी रूप में कोई द्विज पत्नी थी। उसने शाप दिया हे दुष्ट ! तुम्हारे कोई संतान नहीं होगी और जब तक श्री शंकर जी को प्रसन्न नहीं करोगे पुत्र नहीं पाओगे। उसके शाप से चांडू के उस जन्म में कोई संतान नहीं हुई। इसके बाद वह पुष्कर के पास रहने लगा।
बहुत समय तक पुष्कर सरोवर में स्नान करने मात्र से पुण्य का भागी बना और इस जन्म में राजा हुआ। यह आपका पूर्ववत है। पुनः राजा के अनुरोध पर मुनिराज ने बतलाया कि भगवान शंकर बहुत दयालु है और बहुत जल्दी प्रसन्न होकर मनोरथ सफल करते हैं। यहां से कुछ दूर पूर्व दिशा में भास्कर क्षेत्र हैं जिसके समीप पीपल का एक सूखा पेड़ है। इस पेड़ की जड़ के समीप सात हाथ नीचे शिवलिंग है। आप उसे प्राप्त कर वहां विशाल मंदिर बनवाकर शिवलिंग स्थापित करें और सेवा करें। इससे आपका मनोरथ पूर्ण होगा। आपको पुत्र की प्राप्ति होगी।
राजा ने ऋषिराज के कहे अनुसार कार्य किया और भक्तिभाव से अहर्निश रानी सहित षडाक्षर (ऊँ नमः शिवाय) का जप लगातार दो वर्ष तक करता रहा। एक दिन वृषभध्वज नीलकण्ठ भगवान शिव पार्वती सहित प्रकट हुए। प्रसन्न मुद्रा में भगवान ने राजा से वर मांगने को कहा जब राजा ने पुत्र प्रदान करने का वर मांगा। ‘एवमस्तु’ कहकर भगवान अर्न्तध्यान हो गए।
कुछ दिनों बाद राजा की बड़ी रानी गर्भवती हुई और 10 वें मास एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया। राजा ने इस शुभ बेला पर दिल खोलकर पुण्य किया और पुत्र का नाम सुजान सेन रखा। एक दिन राजा की भेंट जाबाली मुनि से हुई। मुनि ने नवजात पुत्र की कुण्डली देखकर राजा से कहा हे राजन् ! आपका पुत्र रूपवान, बलवान, रणकोविद, सुलक्षण व सर्वगुण सम्पन्न होगा, लेकिन इसकी युवा अवस्था में एक कष्टदायक घटना होगी परंतु परिणाम में सुख पायेगा। राजा का पुत्र धीरे-धीरे 16 वर्ष का होने लगा। राजा ने उसका विवाह राजा युद्धवीर की परम सुन्दरी कन्या चन्द्रावती से कर दिया। कुछ समय बाद राजन ने पुत्र को युवराज बना दिया और स्वयं वानप्रस्थाश्रम ग्रहण करके वन में तपस्या करने चला गया। राजा व रानी ने 12 वर्ष तक वन में घोर तपस्या की और पुष्कर के निकट दोनों ने प्राण त्याग दिये। सुजान सेन ने उनकी अन्त्येष्टि की और उनके निमित्त दान दक्षिणा खूब की।
पुराणों में लिखा है कि राजाओं में चार प्रकार के दुर्व्यसन होते हैं जिनके कारण कष्ट में पड़ते हैं। 1. धूत यानि जुआ 2. मद्यपान 3. मृगया 4. परस्त्री आशक्ति। एक बार सुजान सेन तीसरे व्यसन यानि मृगया में आसक्त होकर अपने मंत्रियों, सभासदों और सामन्तों सहित वन में आखेट खेलने गया। आखेट खेलते हुए वे जब काफी थकान महसूस करने लगे तब वे प्यास बुझाने एक सरोवर के पास गये। वहां कन्द मूल व फल लगे थे। सरोवर में निर्मल जल था। राजा ने सबके साथ सरोवर में जल पिया और वहां विश्राम करने लगे।
तब राजा के अन्य सेवक अपने हथियार जो रक्त रंजित थे, उन्हें सरोवर में धोने लगे। सरोवर का पानी लाल हो गया। संयोग से उसी समय एक ऋषिवर जल पात्र लिये वहां पहुंचे और सरोवर का लाल जल देखकर क्रोधित हुए। सरोवर का जल मुनिगण श्री महेश्वर के यज्ञ में प्रयोग करते थे। तपोनिधान मुनि ने चारों तरफ दृष्टि डाली और मन में संकल्प मात्र से चार कोस के फैलाव का लोहमय दुर्ग बना दिया जिसका कोई द्वार नहीं था। राजा व मंत्रियों को जब यह मालूम हुआ तो चिन्तित हुए किले से बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं था। उन्होंने बहुत कोलाहल किया और दुर्ग तोड़ने का काफी प्रयास किया। तब मुनिगण ने उन्हें श्राप दिया कि तुम सब पाषाण हो जाओ। राजा 72 साथियों सहित पाषाण रूप हो गये।
इस लोहे के किले से बाहर जो सैनिक इत्यादि रह गये थे काफी समय तक राजा का इन्तजार करने के बाद महल में जाकर रानी चन्द्रावती को सब हाल बतलाया। रानी चन्द्रावती यह सब विवरण सुनकर बहुत शोकाकुल हो गई और राजा के सब साथियों की स्त्रियों को भी सूचना दी। राजा युद्धवीर ने अपने शूरवीर पुत्र जयन्त को सिपाहियों के साथ खण्डेला भेजा। जयन्त जब अपनी बहन चन्द्रावती से मिला तो सारा हाल मालुम किया और बहन का रूदन देख न सका। रानी चन्द्रावती के अनुरोध पर शूरवीर जयन्त राजकार्य एक मंत्री के रूप में देखने लगा। कुछ समय उपरान्त जाबाली मुनि नगर में आये जयन्त ने उनका बहुत सत्कार किया और रानी चन्द्रावती की दुःख भरी कहानी सुनाई ! मुनिवर ने रानी चन्द्रावती को बतलाया कि खड़गसेन को पहले बताया कि पुत्र के जीवन में एक घटना घटेगी। सो हे ! रानी तुम्हारा पति मृगया-क्रीड़ा करता हुआ भास्कर क्षेत्र में जा पहुंचा। उस क्षेत्र में 6 महातपस्वी तपोधन ऋषि 88 वर्ष से श्री महेश्वर यज्ञ कर रहे थे यज्ञ सौ वर्षों में समाप्त होने वाला था।
मुनिगण के यज्ञ कार्य में तुम्हारे पति की क्रीड़ा से बाधा होने लगी। मुनि बोले ! हे कल्याणी ! गत वैशाख पूर्णिमा के दिन तुम्हारे पति मंत्रियों सहित जड़ रूप हुए है और उस समय बृहस्पति मेष राशि में स्थित थे। उस यज्ञ को सम्पूर्ण होने में 12 वर्ष शेष है।
कार्तिक शुक्ला के 10वें दिन बारह साल बाद देव गुरु बृहस्पति पुनः मेष राशि में आवेंगे और भगवान महेश प्रकट होंगे। मुनियों की विनती से भगवान शंकर राजा तथा मंत्रियों सहित अन्यों को जीवन प्रदान करेंगे। मुनिवर बोले हे रानी ! अब तुम इस राज्य पर राजा खड़गसेन के छोटे भाई भानूसेन के पोते दण्डधर को बैठा दो और तुम मंत्रीगणों की स्त्रियों सहित पतिव्रत धर्म का पालन करती हुई तुम्हारे श्वसुर द्वारा निर्मित भगवान शंकर के मंदिर में आराधना करो और पंचाक्षर नमः शिवाय का जप करो।
भगवान शंकर शिव के प्रसाद से तुम्हारे पति का जन्म हुआ था और अब उसी आशुतोष उमापति की कृपा से पुनः अपने रूप को धारण करेगा किंतु इसके उपरान्त क्षत्रिय धर्म त्याग कर वैश्य धर्म का धारण सब मंत्रियों सहित करना होगा। रानी चन्द्रावती ने सुजान सेन के चचेरे भतीजे दण्डधर को राजगद्दी पर बैठाया। जयंत पुनः अपने पिता युद्धवीर के पास चला गया।
इधर रानी चन्द्रावती शिवालय में सबके साथ आराधना करने लगी। जब द्वादश वर्ष व्यतीत होने आये तब एक दिन भगवान आशुतोष उमापति प्रकट हुए और रानी की आराधना से प्रसन्न होकर कहने लगे कि तुम्हारे पति बहुत जल्द साथियों सहित मनुष्य रूप धारण करके क्षत्रिय धर्म त्याग देंगे और वैश्य बन जायेंगे। रानी बहुत प्रसन्न हुई। भगवान शंकर अन्तर्ध्यान हो गये। रानी ने इसकी सूचना सबको दी और इस शुभ घड़ी का इन्तजार करने लगी। जयन्त जब अपने बहनोई से मिलने आया तो राजा दण्डधर ने उसका खूब स्वागत किया इधर मुनियों के यज्ञ को सौ वर्ष पूरे हो गये थे।
शुभ मुहूर्त में जब ब्रह्मवादी ऋषियों ने यज्ञ में पूर्ण आहूति दी तो नीलकण्ठ भगवान पार्वती सहित प्रकट हुए। भगवान के दर्शन करके मुनिगण भी कृत्य-कृत्य हो गये। स्तुति करने लगे। छःवों मुनिगण की तपस्या पर प्रसन्न होकर भगवान बोले हे मुनिवरों ! तुम्हारे सब मनोरथ पूर्ण हो, तुम्हारे सब काम पूर्ण होंगे। कोई वस्तु तुम्हें अप्राप्य नहीं रहेगी। तब मुनिवर बोले ! देवाधिदेव भगवान वृषभध्वज ! हम लोगों की क्रोधाग्नि में पड़कर राजा सुजानसेन व उसके साथी पाषाण हो गये हैं। आप कृपा करके इन्हें जीवन दें जिससे हमारे मन को भी शांति मिले।
भगवान शंकर बोले ! हे ऋषिवृन्द ! यह राजा हिंसाक्रम में आसक्त होकर मंत्रियों सहित इस गति को पहुंचा है। अतः इन सबको अपने क्षत्रिय धर्म त्याग कर वैश्य धर्म में प्रवृत होना होगा। यह कहकर शूलपाणि ने यज्ञ की भभूत लेकर मंत्र से उन सब पर छिड़की इससे सब जीवित हो गये। भगवान बोले हे राजन् ! तुम अहिंसा त्याग क्षत्रिय धर्म से वंचित हो जाओ तुम्हारे साथ के 72 मंत्री सामन्तगण वैश्य वृत्ति ग्रहण करें और तुम सबकी वंश परम्परा के लेखन करने वाले जागा होंगे। मुनि द्वारा उत्पन्न लोहदुर्ग भी स्वयं जलकर भस्मीभूत हो जावेगा। आज से यह स्थान पवित्र तीर्थ होगा। इन छः ऋषियों की सन्तान तुम लोगों की जाति में पुरोहित का काम करेंगे। मेरे नाम से तुम्हारी माहेश्वरी वैश्य संज्ञा होगी। इतना कहकर अन्तर्ध्यान हो गये।
तदुपरान्त सब मुनियों के चरणों में पड़कर प्रणाम करने लगे। मुनिगण ने मंगल विप्र के द्वारा राजा दण्डधर की सभा में सूचना भेजी इस पर समस्त बन्धु बान्धव, रानी चन्द्रावती तथा मंत्रियों की स्त्रियांे ने अपने पतियों के चरण स्पर्श किये और मुनिवृन्द को प्रणाम किया।
मुनि की आज्ञानुसार सुजानसेन ने सरोवर में स्नान करके राजा दण्डधर का राज्याभिषेक किया और सबने अपने-अपने वस्त्र आदि सहित सरोवर में स्नान किया। जल में हथियार गल गये और उसकी जगह तुला आ गई। हाथ में लेखनी व मसीपात्र (दवात) थी। मुनियों ने कहा कि महादेव के प्रसाद से सुजानसेन ने जागा वृत्ति पाई और अन्य 72 ने वैश्य वृत्ति।
एक गौत्र में अनेक खांप
- गौत्र
- सिलांस
- सोढ़ांस
- करवांस
- भन्साली
- अत्लसास
- भटयांस
- मानांस
- फाफडांस
- साढांस
- गौतमस्य
- बालांस
- कपिलांस
- कौशिक
- चन्द्रांस
- कश्यप
- खांप
- जाखेटिया, कचोल्या, लढ्ढा, चेचाणी
- सोढ़ाणी, बंग
- करवा, खटवड़ (खटोड़)
- बजाज, भन्साली
- कासट, भूतड़ा
- भट्टड़, मालपानी
- झंवर, अजमेरा
- लखोटिया, धूत, लाहोटी
- पलोड, मोदानी
- कांकाणी, गिलड़ा, अटल,
- जाजू, बिहाणी, बिड़ला, आसावा, बलदेवा
- कांकाणी, राठी, तोतला
- तोषनीवाल, भण्डारी, छापरवाल, पलोड, मणियार
- बाहेती, चोखड़ा, चांडक, आगीवाल
- हुरकट, बाहेती, कलंत्री, सिकची, गगराणी, आगसुड, परतानी, नौलखा


